तत्त्वदर्शन

तत्त्वदर्शन

तत्त्वदर्शन की ओर संक्रमण

उपरोक्त संपूर्ण जीवन-प्रवास का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि जगद्गुरु श्रीमद् रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी का कार्य केवल चरित्रात्मक अथवा संस्थात्मक नहीं है; अपितु वह एक सुव्यवस्थित तत्त्वप्रणाली का जीवनस्वरूप है। जन्म से लेकर बाल्यकाल की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, संत गजानन महाराज के प्रति अखंड निष्ठा, समर्थ सद्गुरु काडसिद्धेश्वर महाराज का शिष्यत्व, सन् १९९२ में गुरु-आज्ञा से संपन्न हुआ नौकरी-त्याग, “स्व-स्वरूप संप्रदाय” की स्थापना, तथा सन् २००५ में जगद्गुरु रामानंदाचार्य पद पर विराजमान होना—इन समस्त घटनाओं से एक अखंड तत्त्वप्रवाह प्रकट होता है। यह तत्त्वप्रवाह ही “विशिष्टाद्वैताधिष्ठित गुरुतत्त्वप्रधान आत्मसाक्षात्कारवाद” है। इस तत्त्वदर्शन में ईश्वर सर्वव्यापी है, जीव उसके अधिष्ठान में स्थित है, जगत ईश्वर-चैतन्य से व्याप्त है, और सद्गुरु उस ईश्वरतत्त्व की अनुभूति का सजीव माध्यम है। अतः उनके चिंतन में गुरुतत्त्व, आत्मसाक्षात्कार, भक्ति, सेवा, आचरण, प्रपंच में परमार्थ तथा सर्वात्मभाव—ये सभी पृथक विषय न होकर एक अखंड जीवनशास्त्र के परस्पर पूरक अंग हैं। इसी तत्त्वप्रवाह का विस्तृत, शास्त्रीय तथा अनुभवाधिष्ठित विवेचन अगले विभाग में किया गया है।

जगद्गुरु श्रीमद् रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी का तत्त्वदर्शन

जगद्गुरु श्रीमद् रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी ने आधुनिक आध्यात्मिक विचारविश्व में एक विशिष्ट तात्त्विक अधिष्ठान स्थापित किया है। उनके चिंतन का केंद्रबिंदु केवल पारंपरिक भक्ति, संप्रदाय अथवा उपासना नहीं है; अपितु गुरुतत्त्वाधिष्ठित आत्मसाक्षात्कार, समस्त मानवता में निहित ईश्वरी चेतना की जागृति, भक्ति-सेवा-आचरण का समन्वय, तथा प्रपंच में स्थित रहकर परमार्थ की साधना—यह उनकी जीवनदृष्टि का सार है। उनके तत्त्वचिंतन में शास्त्र, साधना, सद्गुरु, सेवा, विज्ञानदृष्टि तथा आत्मानुभव का एक अद्वितीय संगम दृष्टिगोचर होता है।

१. विशिष्टाद्वैताधिष्ठित गुरुतत्त्वप्रधान आत्मसाक्षात्कारवाद :

जगद्गुरुजी की तत्त्वप्रणाली का मूलाधार “गुरुतत्त्वाधिष्ठित आत्मसाक्षात्कारवाद” है। उनके मतानुसार मनुष्यजन्म का परम उद्देश्य बाह्य सफलता, भोग, पद या प्रतिष्ठा नहीं, अपितु स्व-स्वरूप की अनुभूति है। यह आत्मबोध केवल बौद्धिक चिंतन अथवा कर्मकांड से सिद्ध नहीं होता; वह सद्गुरु-कृपा तथा अंतःकरण में निहित चेतना की जागृति से संपन्न होता है। अतः उनके तत्त्वज्ञान में गुरु केवल उपदेशक नहीं, अपितु आत्मस्वरूप की ओर मार्गदर्शन करने वाले दृष्टिदाता हैं।

२. भेदरहित अध्यात्मदृष्टि :

उनके अध्यात्मविचार का एक विशिष्ट गुण यह है कि उन्होंने जाति, वर्ण, लिंग, धन-दौलत, निर्धन-समृद्ध—इन समस्त लौकिक विभाजनों को आत्मतत्त्व की दृष्टि से गौण माना। उनके अनुसार जीव का मूल स्वरूप देहाधिष्ठित न होकर चैतन्याधिष्ठित है। इसीलिए वे अध्यात्म को किसी सामाजिक अभिजनता में सीमित न रखकर सर्वसुलभ बनाते हैं। यह विचार केवल सामाजिक समता का संदेश नहीं, अपितु आत्मतत्त्व की सार्वभौमिकता का प्रतिपादन है।

३. आत्मसाक्षात्कार की प्रत्यक्ष साध्यता :

अनेक संत-महात्मा मोक्ष, ज्ञान अथवा भगवद्प्राप्ति के विषय में प्रतिपादन करते हैं; किंतु जगद्गुरुजी ने आत्मसाक्षात्कार को केवल तात्त्विक अथवा दूरस्थ आदर्श न मानकर, प्रत्यक्ष रूप से साध्य होने वाली अनुभूति के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार उनकी शिक्षाओं में अध्यात्म केवल श्रवण का विषय न रहकर, जीवन में आचरित होने वाला सत्य बन जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण उनके तत्त्वज्ञान में अनुभवाधिष्ठित प्रतिज्ञा का सशक्त दर्शन होता है।

४. “तुम स्वयं जियो, दूसरों को जीने दो” : मानवजन्म की आध्यात्मिक दृष्टि :

उनका प्रसिद्ध सूत्र — “तुम स्वयं जियो, दूसरों को जीने दो” — केवल एक सामान्य सामाजिक वाक्य नहीं, अपितु एक गूढ़ आध्यात्मिक तत्त्व है। उनके मतानुसार—

  • “तुम स्वयं जियो” — अर्थात् अपने मूल स्वरूप, आत्मचैतन्य तथा ईश्वरी अधिष्ठान की अनुभूति करो।
  • और “दूसरों को जीने दो” — अर्थात् अज्ञान के कारण स्वयं से विमुख हुए जीवों में आत्मजागृति का संचार करो; उनके अंतर्निहित सुप्त चेतन को जागृत करो।

इस प्रकार यह सूत्र केवल सहजीवन अथवा सहअस्तित्व का संदेश नहीं देता, अपितु स्वानुभूति तथा परजागृति—इन दोनों स्तरों पर आध्यात्मिक कर्तव्य का निरूपण करता है।

५. “अणु-रेणु में ईश्वर” : ईश्वर की सर्वव्यापक संकल्पना :

जगद्गुरुजी द्वारा प्रतिपादित “अणु-रेणु में ईश्वर है” यह सिद्धांत उनके तत्त्वज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है। इस संकल्पना में ईश्वर केवल मंदिर, प्रतिमा, ग्रंथ अथवा कर्मकांड तक सीमित नहीं है; अपितु संपूर्ण सृष्टि के प्रत्येक अणु-रेणु में व्याप्त है—यह अनुभूति निहित है। यह दृष्टिकोण अद्वैत के सर्वात्मभाव, विशिष्टाद्वैत की ईश्वराधिष्ठित विश्वदृष्टि तथा भक्तिपरक अनुभूति का एक सजीव समन्वय है।

६. तत्त्व केवल प्रतिपादित नहीं, अपितु आचरित : “अणु-रेणु में ईश्वर” की अनुभूति का जीवनरूप :

जगद्गुरु श्रीमद् रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी के आध्यात्मिक दर्शन का एक विशिष्ट गुण यह है कि उनके द्वारा प्रतिपादित तत्त्व केवल वाङ्मय अथवा उपदेश के स्तर तक सीमित न रहकर, उनके जीवन में प्रत्यक्ष आचरण के रूप में अभिव्यक्त हुए। “अणु-रेणु में ईश्वर है” यह संकल्पना उनके लिए केवल एक विचारधारा न होकर, जीवनानुभूति से प्रतिष्ठित सत्य थी। इस अनुभूति के अनुसार परमात्मा किसी एक विशेष रूप में सीमित नहीं है; अपितु समस्त चराचर सृष्टि के प्रत्येक कण में व्यापित परब्रह्मतत्त्व है। अतः उन्होंने देह, काल और रूप की सीमाओं का अतिक्रमण कर ईश्वर का साक्षात्कार सर्वव्यापी चैतन्यस्वरूप में किया।

इसी परिप्रेक्ष्य में संतपरंपरा के गजानन महाराज के प्रति उनका भाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके लिए गजानन महाराज केवल ऐतिहासिक संत अथवा भक्तिभाव के केंद्र न होकर, उस सर्वव्यापी परब्रह्मतत्त्व के सजीव, सुलभ एवं अनुभवरूप अधिष्ठान थे। यहाँ एक सूक्ष्म किन्तु महत्वपूर्ण भेद को समझना आवश्यक है—जगद्गुरु नरेंद्राचार्यजी की भूमिका किसी भी देवताभेद का निषेध करने वाली नहीं है, अपितु समस्त देवताओं में एक ही परब्रह्मतत्त्व की अनुभूति करने वाली है। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इस छांदोग्य उपनिषद (३.१४.१) के महावाक्य के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि तथा समस्त देवतारूपों में एक ही परब्रह्मतत्त्व का अनुभव होता है।

नरेंद्राचार्यजी के मतानुसार राम, कृष्ण, विष्णु, शिव अथवा देवी—इन सभी आराध्यरूपों में जो निर्गुण, गतिमान एवं सर्वव्यापी ब्रह्म विद्यमान है, वही तत्त्व संतस्वरूप में भी प्रकट होता है। अतः व्यवहारिक स्तर पर भले ही विविध देवतारूप भिन्न प्रतीत हों, तथापि तात्त्विक (परमार्थिक) स्तर पर वे सभी एक ही परब्रह्म की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।

इस एकत्वदृष्टि के कारण उनकी व्यक्तिगत साधना में कोई विरोधाभास उत्पन्न नहीं होता। समस्त देवताओं में एक ही परब्रह्मतत्त्व का अनुभव कराने वाली यह एकत्वदृष्टि अद्वैत वेदान्त के अनुरूप है, तथा विशिष्टाद्वैत के अधिष्ठान पर स्थित है। अपितु एक ही तत्त्व की विविध रूपों में अनुभूति ही उनके साधनामार्ग का मूल तत्त्व बन जाती है। इसी कारण उन्होंने अपने अंतःकरण से स्वीकृत संतस्वरूप—गजानन महाराज में—उस परब्रह्म का दर्शन किया और उसी भाव से उनकी अखंड उपासना करते हैं।

इस प्रकार यहाँ किसी भी देवता का अवमान अथवा किसी एक के प्रति चयनात्मक आग्रह नहीं है; “एकमेव परब्रह्मतत्त्व, विविध रूपों में प्रकट” यह वेदान्तीय सिद्धांत जीवन में आचरित रूप में प्रकट होता हुआ दृष्टिगोचर होता है।

इसी कारण उनका अध्यात्म संकीर्ण उपासना की सीमाओं में आबद्ध न रहकर—

  • तात्त्विक दृष्टि से एकत्ववादी,
  • भक्ति की दृष्टि से निष्ठापूर्ण,
  • तथा अनुभूति की दृष्टि से सजीव

—ऐसा त्रिमितीय स्वरूप धारण करता है।

“देवतारूप अनेक हो सकते हैं, किंतु उनका अधिष्ठान एक ही है; उस एक परब्रह्म की अनुभूति जिसमें होती है, वही साधक के लिए आराध्य बनता है।” यहाँ की भूमिका किसी भी देवताभेद का निषेध करने वाली नहीं, अपितु समस्त देवताओं में एक ही परब्रह्मतत्त्व की अनुभूति का दिग्दर्शन कराने वाली है।

विशेषतः, सन् २००५ में रामानंदी परंपरा के आचार्यपद पर विराजमान होने के पश्चात भी उन्होंने अपने उपास्य देवता के प्रति मूल निष्ठा में किंचित भी परिवर्तन नहीं किया। यद्यपि रामानंदी परंपरा में श्रीराम को आराध्य देवता माना जाता है, तथापि उनके अंतःकरण में संत गजानन महाराज के प्रति स्थित परमात्मभाव अखंड एवं अचल बना रहा। इस स्थिति में कोई विरोधाभास नहीं, अपितु यह उनकी तत्त्वनिष्ठा की अखंड अभिव्यक्ति है। उनके मतानुसार परब्रह्म एक ही है, और रामादि समस्त देवतारूपों की भाँति उसी एक तत्त्व की अनुभूति संत गजानन महाराज के स्वरूप में भी होती है।

७. सद्गुरुतत्त्व ही ईश्वरी तत्त्व है :

नरेंद्राचार्यजी की विशिष्टाद्वैताभिमुख तत्त्वमंडना में सद्गुरुतत्त्व अत्यंत केंद्रीय स्थान रखता है। उनके मतानुसार यदि जीव में निहित ईश्वरी तत्त्व की पहचान करनी हो, तो उस पहचान की दृष्टि प्रदान करने वाला सद्गुरु आवश्यक है। अतः वे दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते हैं कि सद्गुरु पृथ्वी पर स्थित चलायमान परमात्मा हैं। यह वचन व्यक्तिपूजा नहीं है, अपितु आत्मबोध की प्रक्रिया में गुरुकृपा के अनिवार्य स्थान का प्रतिपादन है। गुरुकृपा के अभाव में आत्मसाक्षात्कार अत्यंत दुष्प्राप्य है—यह उनकी स्पष्ट भूमिका है।

८. समस्त प्राणिमात्र की सेवा :

उनके तत्त्वज्ञान में सेवा परमार्थ की गौण प्रक्रिया नहीं, अपितु वही ईश्वरभक्ति की प्राणशक्ति मानी जाती है। समस्त प्राणिमात्र की सेवा ही देवत्व की सेवा है—यह उनकी दृढ़ मान्यता है। यह भाव केवल मानवकेंद्रित न होकर समस्त सजीव जगत तक विस्तृत है, और करुणा, समर्पण तथा सर्वात्मभाव—इन तीन आधारों पर उनकी सेवा-दृष्टि प्रतिष्ठित है।

इस विचार को उपनिषदों का सुदृढ़ आधार प्राप्त होता है। ईशोपनिषद में—

“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”

(मंत्र ६)

इस मंत्र के अनुसार, जो साधक समस्त प्राणिमात्रों में आत्मतत्त्व का दर्शन करता है और सबमें अपने ही स्वरूप का अनुभव करता है, वह किसी का भी तिरस्कार नहीं करता। इस सर्वात्मभाव से ही सेवा केवल दया या कर्तव्य न रहकर, ईश्वरभक्ति का साकार रूप बन जाती है। इस प्रकार समस्त प्राणिमात्र की सेवा उनके तत्त्वज्ञान में उपनिषदाधिष्ठित सर्वात्मदृष्टि का व्यवहारिक (प्रायोगिक) स्वरूप बनकर प्रकट होती है।

९. भक्ति, सेवा और आचरण : परमात्मप्राप्ति की त्रयी

उनके मतानुसार भक्ति, सेवा और आचरण के बिना परमात्मप्राप्ति संभव नहीं है। स्व-स्वरूप की पहचान, आत्मज्ञान अथवा मोक्ष केवल विचारों या बौद्धिक विमर्श से प्राप्त नहीं होते; इसके लिए अंतःकरण की शुद्धि, जीवन की सात्त्विकता तथा भावना की निष्कपटता आवश्यक है।

  • भक्ति शुद्ध अंतःकरण से की जानी चाहिए; बाह्य शुचिता-अशुचिता, आडंबर अथवा प्रदर्शन को अंतिम मूल्य प्राप्त नहीं है।
  • सेवा हृदयपूर्वक की जानी चाहिए; उसका श्रेय स्वयं ग्रहण न कर, परमात्मस्वरूप गुरु को अर्पित करना चाहिए। तभी सेवा परोपकारमयी बनती है।
  • आचरण सात्त्विक होना चाहिए; जब रजोगुण और तमोगुण का क्षय होकर मन में शुद्धता का विकास होता है, तब वैराग्य, विरक्ति तथा आत्मज्ञान के लिए अनुकूल अंतःभूमि निर्मित होती है।

यह त्रयी उनके आध्यात्मिक जीवनशास्त्र की व्यवहारिक संरचना है।

१०. मोक्ष के लिए आत्मसाक्षात्कारी सत्पुरुष की शरणागति :

उनके मतानुसार मोक्षप्राप्ति के लिए जीव को आत्मसाक्षात्कारी सत्पुरुष की ही शरण ग्रहण करनी चाहिए। परंतु यह शरणागति अंधानुकरण पर आधारित नहीं होनी चाहिए। गुरु का निर्णय करने से पूर्व यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उस सद्गुरु में आत्मप्रचीति, गुरुप्रचीति तथा शास्त्रप्रचीति विद्यमान है या नहीं। वही सायुज्यमुक्ति का प्रदाता है—इस विषय में जब अंतर्बोध से दृढ़ निश्चय हो जाए, तभी सर्वस्व समर्पण करना चाहिए। अतः उनकी परंपरा में गुरु-श्रद्धा तो है, परंतु वह विवेकशून्य नहीं है; अपितु अनुभव, परीक्षा और निश्चय पर आधारित है।

११. प्रपंच में रहकर परमार्थ :

नरेंद्राचार्यजी ने प्रपंच-त्याग का एकांगी आग्रह न करते हुए “प्रपंच में रहकर परमार्थ करो” यह जीवनदृष्टि प्रदान की। कर्मसिद्धांत के अनुसार जीव प्रपंच में आता है; अतः उन कर्मों के परिपाक का अनुभव किए बिना आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती। यह दृष्टिकोण संन्यासकेंद्रित अध्यात्म को संतुलित गृहस्थ-परमार्थ की दिशा प्रदान करता है। इससे सामान्य गृहस्थ के लिए भी अध्यात्म सुलभ तथा साध्य प्रतीत होता है।

१२. विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय :

उन्होंने एक अत्यंत सूक्ष्म त्रिसूत्री प्रस्तुत की — “नेत्र विज्ञानवादी, मन आध्यात्मवादी और बुद्धि यथार्थवादी।” इस एक वाक्य में आधुनिक मानव के जीवन का संतुलित मार्ग निहित है।

  • नेत्र विज्ञानवादी — अर्थात् निरीक्षण, तथ्य, परीक्षण और वस्तुनिष्ठता।
  • मन आध्यात्मवादी — अर्थात् मूल्य, करुणा, अंतर्मुखता और ईश्वरसंवेदना।
  • बुद्धि यथार्थवादी — अर्थात् व्यवहार, समन्वय और संतुलित निर्णय।

इस त्रिसूत्री के माध्यम से उन्होंने अध्यात्म को अंधविश्वास से तथा विज्ञान को निःसंवेदनशीलता से सुरक्षित रखते हुए दोनों का सृजनात्मक समन्वय स्थापित किया।

१३. लोकभाषा में भक्ति तथा आधुनिक माध्यमों का स्वीकार :

उन्होंने भक्ति को केवल पारंपरिक मठ-मंदिरों की सीमाओं में सीमित न रखकर, लोकभाषा, साहित्य, गद्य, पद्य तथा आधुनिक डिजिटल माध्यमों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। उनके मतानुसार भक्ति केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, अपितु मन की एकाग्रता का अभ्यास है। अतः मन के संस्कार हेतु साहित्य-रचना, अभंग, काव्य, प्रवचन तथा आधुनिक माध्यमों के उपयोग को उन्होंने साधनरूप में स्वीकार किया। इससे उनके कार्य में पारंपरिक अध्यात्म और आधुनिक संप्रेषण का सुसंवादी रूप प्रत्यक्ष होता है।

१४. गुरु-भक्ति, वैराग्य और जीवन में प्रत्यक्ष आचरण :

उनके जीवन का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष अपने उपास्य देवता और सद्गुरु के प्रति उनकी अखंड निष्ठा है। उन्होंने संत गजानन महाराज के प्रति पतिव्रता के समान प्रेम रखा। स्वयं को उन्होंने गजानन महाराज के चरणों की वहाण माना—यह दास्यभक्ति उनके अंतर्मन के समर्पण की साक्षी है।

समर्थ सद्गुरु काडसिद्धेश्वर महाराज की आज्ञा के प्रति उनकी निष्ठा तो विलक्षण थी। मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में, जब उनके पास युवा पत्नी, लघु पुत्र और स्थिर नौकरी थी, तब भी गुरु-आदेश प्राप्त होते ही उन्होंने तत्क्षण नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। यह घटना उनके जीवन में गुरु-वचन के प्रति निष्ठा का ज्वलंत उदाहरण है।

गुरुकृपा से कुछ ही महीनों में उनके भीतर वैराग्य की परिपक्व अवस्था उदित हुई। संसार मिथ्या प्रतीत होने लगा, प्रपंच-त्याग का संकल्प दृढ़ हो गया। किंतु उसी समय पत्नी की विनती के पश्चात् सद्गुरु ने उन्हें आज्ञा दी कि प्रपंच में रहकर ही परमार्थ का आचरण करना है। उन्होंने इस आज्ञा का आजीवन पालन किया। कमल के समान जल में स्थित रहकर भी उससे अलिप्त रहना—ऐसी उनकी जीवनदृष्टि है। बाह्यतः गृहस्थ, किंतु अंतःकरण से अनासक्त—यह उनके जीवन का अद्वितीय संतुलनबिंदु बना।

सन् २००५ में जब उन्हें जगद्गुरुपद पर प्रतिष्ठित करने का अवसर आया, तब भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भगवान रामानंदाचार्य संन्यासी थे; परंतु वे स्वयं गृहस्थ हैं, और सद्गुरु की आज्ञा के विरुद्ध संन्यास स्वीकार नहीं करेंगे। उनके लिए जगद्गुरुपद से भी गुरु-आज्ञा श्रेष्ठ है—यह उनकी भूमिका केवल विनम्रता नहीं, अपितु गुरुतत्त्व के परम प्राधान्य की उद्घोषणा है। इसी कारण वे केवल अध्यात्म का उपदेश नहीं करते, अपितु अपने जीवन के द्वारा उसे प्रत्यक्ष रूप में जीकर प्रदर्शित करते हैं।

१५. जगद्गुरुपद के पश्चात् भी अविचल निष्ठा :

जगद्गुरुपद पर विराजमान होने के पश्चात् भी उन्होंने अपने उपास्य देवता संत गजानन महाराज तथा सद्गुरु के रूप में समर्थ सद्गुरु काडसिद्धेश्वर महाराज के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण में कोई परिवर्तन नहीं किया। वे आज भी उन दोनों के चरणों में नतमस्तक हैं। उनकी अभंग-रचनाओं में गुरु-दास्यभाव, परमात्मनिष्ठा, समर्पण तथा अंतःकरण की अखंड तड़प स्पष्ट रूप से अनुभूत होती है। इससे उनकी काव्यमय भक्ति और तात्त्विक निष्ठा—इन दोनों की सुसंगति प्रत्यक्ष होती है।

प्रस्तुत ग्रंथ में प्रतिपादित तत्त्वदर्शन केवल किसी एक संप्रदाय तक सीमित न रहकर, वेद–वेदांत परंपरा के व्यापक अधिष्ठान के अनुरूप एक समन्वयात्मक आध्यात्मिक चिंतन के रूप में प्रतिष्ठित होता है। इन विचारों का केंद्र—स्व-स्वरूप की अनुभूति, सद्गुरु-कृपा का महत्त्व, भक्ति-सेवा-आचरण का समन्वय तथा प्रपंच में स्थित रहकर परमार्थ की साधना—ये सभी तत्त्व वेदों की सर्वव्यापी ईश्वरदृष्टि, उपनिषदों के आत्मा-ब्रह्म ऐक्य तथा वेदांत के मोक्षमार्ग के सिद्धांतों के साथ समन्वित रूप से संबद्ध प्रतीत होते हैं।

वेदों द्वारा प्रतिपादित “सर्वत्र ईश्वर है” यह सिद्धांत, उपनिषदों द्वारा निरूपित “आत्मा और ब्रह्म का ऐक्य” तथा वेदांत द्वारा प्रदर्शित साधना–मोक्ष का मार्ग—इन त्रिसूत्रों का व्यवहारिक एवं अनुभवाधिष्ठित प्रकटीकरण इस तत्त्वप्रणाली में दृष्टिगोचर होता है। “अणु-रेणु में ईश्वर है”, “समस्त प्राणिमात्र की सेवा”, “भक्ति-सेवा-आचरण” की त्रयी, तथा गुरुतत्त्व का केंद्रीय स्थान—ये सभी वेदांत के तत्त्वों के जीवनस्वरूप के रूप में अभिव्यक्त हुए हैं। इसी प्रकार वेदांगों द्वारा सूचित शुद्ध आचरण, अनुशासन तथा जीवनसंयम की आवश्यकता भी इस शिक्षण में व्यवहारिक स्तर पर रेखांकित होती है। वहीं शास्त्र, गुरु और आत्मप्रचीति—इस त्रिसूत्र के माध्यम से ज्ञान, अनुभव और आचरण का संतुलित समन्वय स्थापित होता है।

इस प्रकार, इस प्रकरण में प्रतिपादित विशेषताओं का सम्यक् विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह तत्त्वप्रवाह वेद–वेदांत परंपरा से पृथक नहीं है; अपितु उसी का आधुनिक, जीवनोन्मुख एवं अनुभवप्रधान अभिव्यक्ति है। अतः यह तत्त्वज्ञान केवल विचार के स्तर तक सीमित न रहकर, जीव को स्व-स्वरूप की अनुभूति की ओर अग्रसर करने वाला तथा समाजजीवन को सात्त्विक दिशा प्रदान करने वाला एक समग्र आध्यात्मिक जीवनशास्त्र के रूप में प्रत्यक्ष होता है।